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तुमसे जुदा न होंगे हम

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तुमसे जुदा न होंगे हम किरदार: · देव: ऑफिस का शांत, समझदार और मेहनती यंग मैनेजर। · एजे (AJ): ऑफिस की हंसमुख, एनर्जेटिक और सबकी मदद करने वाली टीम मेंबर। --- अध्याय 1: 9 फरवरी, 2026 - जसोला मूवी इनॉक्स ऑफिस में दोनों सिर्फ ‘हैलो-हाय’ तक ही सीमित थे। देव टीम लीड था, एजे उसी की टीम में जूनियर। उस दिन शनिवार था। देव अपने दोस्तों के साथ 'बॉर्डर' फिल्म देखने जसोला सिनेमा पहुंचा। अचानक टिकट काउंटर पर उसकी नज़र एजे पर पड़ी। देव (मन में): "ये एजे? यहाँ?" वह अकेली थी, थोड़ी परेशान। सब शो हाउसफुल थे। एजे: "एक टिकट मिलेगा क्या? 'बॉर्डर' का?" काउंटर वाले ने मना कर दिया। तभी देव ने आवाज़ लगाई। देव: "एजे! तुम यहाँ?" एजे (चौंककर): "देव सर! मैं... फिल्म देखने आई थी, लेकिन टिकट नहीं है।" देव ने अपना एक्स्ट्रा टिकट उसकी ओर बढ़ा दिया। उसके दोस्त ने शरारत से आँख मारी। देव: "चलो साथ में बैठते हैं। 'बॉर्डर' अकेले देखने में मज़ा नहीं आता।" फिल्म शुरू हुई। जैसे-जैसे फिल्म में सुनिल शेट्टी 'बॉर्डर पार नहीं जाने देंगे' डा...

तुमसे जुदा न होंगे हम

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तुमसे जुदा न होंगे हम किरदार: · देव: ऑफिस का शांत, समझदार और मेहनती यंग मैनेजर। · एजे (AJ): ऑफिस की हंसमुख, एनर्जेटिक और सबकी मदद करने वाली टीम मेंबर। --- अध्याय 1: 9 फरवरी, 2026 - जसोला मूवी इनॉक्स ऑफिस में दोनों सिर्फ ‘हैलो-हाय’ तक ही सीमित थे। देव टीम लीड था, एजे उसी की टीम में जूनियर। उस दिन शनिवार था। देव अपने दोस्तों के साथ 'बॉर्डर' फिल्म देखने जसोला सिनेमा पहुंचा। अचानक टिकट काउंटर पर उसकी नज़र एजे पर पड़ी। देव (मन में): "ये एजे? यहाँ?" वह अकेली थी, थोड़ी परेशान। सब शो हाउसफुल थे। एजे: "एक टिकट मिलेगा क्या? 'बॉर्डर' का?" काउंटर वाले ने मना कर दिया। तभी देव ने आवाज़ लगाई। देव: "एजे! तुम यहाँ?" एजे (चौंककर): "देव सर! मैं... फिल्म देखने आई थी, लेकिन टिकट नहीं है।" देव ने अपना एक्स्ट्रा टिकट उसकी ओर बढ़ा दिया। उसके दोस्त ने शरारत से आँख मारी। देव: "चलो साथ में बैठते हैं। 'बॉर्डर' अकेले देखने में मज़ा नहीं आता।" फिल्म शुरू हुई। जैसे-जैसे फिल्म में सुनिल शेट्टी 'बॉर्डर पार नहीं जाने देंगे' डा...

मैं कोई कवि, नहीं वह भी नहीं हूं।

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मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं ना ही कोई लेखक ना ही कोई रचनाकार जो रह सकता है कोई रचना जो हो अद्भुत  अकल्पनीय है जो रचयिता को पसंद हो परंतु मैं हूं एक चिंतन मैं हूं एक सड़क जो सकता है अपने जीवन को अपने ही मृदुल मदन से अपने ही ध्वनि धन से अपने ही चिंतन मनन से है मैं हूं हूं इंसान मैं हूं मनुष्य में हूं कोई आत्मा मुझे क्या पता मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं ना वही कोई रचना लिख सकता हूं मुझे तो जबरदस्ती यहां ला दिया गया है जैसे उठाकर खड़ा कर दिया हो किसी बंबू को किसी ट्रिपल के शाह रे किसी आयोजन में जब वह खड़ा रहता है ठंड लोगों से पड़कर आगे बढ़ते हैं या उसके सारे खड़े हो जाते हैं या उसको देखकर समझ जाते हैं मैं इस बंबू की तरह हूं मैं हूं क्या मुझे भी नहीं पता पर आपके बीच में हूं इसलिए हूं क्योंकि मैं आत्मा हूं मैं हूं मैं धर्मेंद्र हूं मेरा नाम क्या है मैं हूं क्या आप जानते हैं आप कौन हो आप जानते हैं क्या बताइए ना आप कौन है आपका नाम है मेरा नाम ऐसे हूं यहां जैसे विक्रम के पीछे बेताल पड़ जाता है और बच्चे से लग जाता है जो उमंग है जो आनंद है जो पल है जो नहीं भी

वो स्वयं को रचिता समझ बैठी हैं।

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वो अपनी आवाज को बुलंद करने के माध्यम से अपने चरित्र को किसी अन्य प्रकार से व्यक्त करने में मस्त। दुनिया एक तरफ अस्त होने को हैं , किंतु महिलाओं का आचरण वैसे हैं जैसे उनकी अकल पागल हाथी जैसे हो गई हैं। कारण बढ़ती हुई विकृत मानसिकता हैं। समाज में बड़का बदलाव क्यूं आया हैं ये मैगनेटिक या टेक्निकल फॉल्ट नही हैं।  वो स्वयं को रचिता समझ बैठी हैं। इसका अंत कब होगा , गीता के माध्यम से बताना चाहुंगा । जिनको अपनी नाक और कान किसी ने और साफ करना सिखाया हो वो सीट पे बैठ कर अपने आप को इंद्रा गांधी समझ बैठी हैं। जा तेरा भी अंत ऐसे हो। कष्ट की बात ये हैं , जिन मां बहनों की रक्षा के लिए सारी उमर लड़ते रहे आज एक विकृत मानसिकता वाली लड़की हाथ के इशारे से हमको दूर हटने के लिए कहती है जैसे कोई मर्द कुत्ता हो। राम ही मालिक है ऐसे लोगो का। हम तो अपने राह चले जायेंगे , इस वृतान्त का यही अंत करते हैं अथवा दिल पे लेके उसको जवाब दें। क्या करें। जय सिया राम। 

बांस और बेताल

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पटकथा (स्क्रिप्ट) शीर्षक: बांस और बेताल लेखक: धर्मेन्द्र अवधि: 45 मिनट विधा: दार्शनिक नाटक/आध्यात्मिक संवाद लॉगलाइन: एक साधारण इंसान और उसकी गाय के बीच का अदृश्य संवाद, जो एक बांस की तरह जीवन के मेले में खड़े होकर यह सवाल पूछता है - "मैं कौन हूं?" (स्क्रीन पर सफेद अक्षरों में लिखा आता है: "यह कहानी उस हर इंसान की है जिसे कभी यह खयाल आया हो कि 'मैं यहां क्यों हूं?' और जिसे जवाब न मिला हो।") --- दृश्य 1: सुबह की धुंध और एक बांस (0-8 मिनट) स्थान: एक सुनसान गांव की पगडंडी। चारों ओर हल्की धुंध। पास में एक पुराना पीपल का पेड़। नीचे एक सूखा बांस खड़ा है, जिस पर एक पुरानी फटी शॉल लिपटी है। (कैमरा धीरे-धीरे पैन करता है और बांस के पास बैठे एक आदमी को दिखाता है। नाम - देव। उम्र करीब 45-50 साल। आंखों में गहराई और चेहरे पर एक अजीब सी शांति। पास ही एक गाय बंधी है - उसकी आंखें बड़ी और नम।) (देव गाय के गले में हाथ फेर रहा है। गाय रंभाती है, मानो कुछ कह रही हो।) देव (गाय से): सुन गौरी... रात को नींद नहीं आई। एक सवाल बार-बार मन में आ रहा था। ये जो मैं हूं ना... ये...

पृथ्वी का पाठ

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लेखक - धर्मेन्द्र शीर्षक - पृथ्वी का पाठ (या "धर्म संकल्प") 🎬 फिल्म का अवलोकन · अवधि: 2 घंटे (120 मिनट) · केंद्रीय विषय: "जीवन में जितनी जरूरत उतना ही उपयोग, संसाधनों का दोहन लालच नहीं धर्म है।" · स्थान: आधुनिक शहर (60%) और एक सुदूर हिमालयी आश्रम (40%)। · मुख्य किरदार:   · गुरु योगिराज: 70 वर्ष, कठोर लेकिन वात्सल्यमूर्ति, वेद-पुराणों के ज्ञाता।   · अर्जुन: 28 वर्ष, टेक बिलिनेयर, तेजतर्रार लेकिन बुझा हुआ।   · शिखा: 26 वर्ष, पर्यावरण वैज्ञानिक, अर्जुन की प्रेरणा।   · गगन: 50 वर्ष, लालची उद्योगपति, अर्जुन का प्रतिस्पर्धी। 📖 पूरी कहानी और बेहतरीन डायलॉग्स के साथ स्क्रीनप्ले (यह हिंदी स्क्रीनप्ले पारंपरिक फिल्म स्क्रिप्ट के मानकों के अनुसार लिखा गया है। हम शुरू करते हैं।) फिल्म की शुरुआत [दृश्य 1 - चित्रकूट आश्रम, उत्तराखंड - सुबह] आकाश में ब्रह्म मुहूर्त की उजास। मंद-मंद पवन बह रही है। हिमालय की बर्फीली चोटियाँ पृष्ठभूमि में हैं। आश्रम में यज्ञ की धूप से वातावरण महक रहा है। गुरु योगिराज एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे बैठे हैं। उनके 30-40 शिष्य उनके चारों ओ...

दो किनारे (Two Shores)

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यह एक दिलचस्प और भावनात्मक विषय है। यहाँ एक पटकथा (Screenplay) है जो व्यक्तिगत प्रेम (GF) और देश प्रेम (Patriotism) के बीच के द्वंद्व को दर्शाती है। ## **फिल्म का शीर्षक: दो किनारे (Two Shores)** **पात्र:**  1. **आर्यन:** एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर जिसे विदेश में बड़ा ऑफर मिला है और वह अपनी प्रेमिका (समीरा) के साथ वहां बसना चाहता है।  2. **कबीर:** आर्यन का सबसे अच्छा दोस्त, एक सामाजिक कार्यकर्ता जो मानता है कि असली सुकून अपनी मिट्टी और जड़ों में है। ### **दृश्य 1: एक पुरानी हवेली की छत - शाम** (आर्यन पैकिंग कर रहा है। कबीर खामोश खड़ा डूबते सूरज को देख रहा है। हवा में थोड़ी उदासी है।) **आर्यन:** (उत्साह में) कबीर, तू समझ क्यों नहीं रहा? वहाँ 'लाइफ' है। समीरा और मैं वहाँ अपना एक छोटा सा संसार बसाएंगे। यहाँ क्या है? भीड़, प्रदूषण और अंतहीन संघर्ष। **कबीर:** (मुड़ते हुए) जिसे तू भीड़ कह रहा है, वो तेरे अपने लोग हैं, आर्यन। और जिसे तू संघर्ष कह रहा है, वो दरअसल अपनी ज़मीन को बेहतर बनाने की कोशिश है। तू जा रहा है क्योंकि तुझे 'तैयार' घर चाहिए, तू उसे 'बनाना' नह...