बांस और बेताल
पटकथा (स्क्रिप्ट)
शीर्षक: बांस और बेताल
लेखक: धर्मेन्द्र
अवधि: 45 मिनट
विधा: दार्शनिक नाटक/आध्यात्मिक संवाद
लॉगलाइन: एक साधारण इंसान और उसकी गाय के बीच का अदृश्य संवाद, जो एक बांस की तरह जीवन के मेले में खड़े होकर यह सवाल पूछता है - "मैं कौन हूं?"
(स्क्रीन पर सफेद अक्षरों में लिखा आता है: "यह कहानी उस हर इंसान की है जिसे कभी यह खयाल आया हो कि 'मैं यहां क्यों हूं?' और जिसे जवाब न मिला हो।")
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दृश्य 1: सुबह की धुंध और एक बांस (0-8 मिनट)
स्थान: एक सुनसान गांव की पगडंडी। चारों ओर हल्की धुंध। पास में एक पुराना पीपल का पेड़। नीचे एक सूखा बांस खड़ा है, जिस पर एक पुरानी फटी शॉल लिपटी है।
(कैमरा धीरे-धीरे पैन करता है और बांस के पास बैठे एक आदमी को दिखाता है। नाम - देव। उम्र करीब 45-50 साल। आंखों में गहराई और चेहरे पर एक अजीब सी शांति। पास ही एक गाय बंधी है - उसकी आंखें बड़ी और नम।)
(देव गाय के गले में हाथ फेर रहा है। गाय रंभाती है, मानो कुछ कह रही हो।)
देव (गाय से): सुन गौरी... रात को नींद नहीं आई। एक सवाल बार-बार मन में आ रहा था। ये जो मैं हूं ना... ये क्या हूं? तू बता ना... तू तो सब जानती है। तेरी आंखों में वो ज्ञान है जो किताबों में नहीं। तू कभी सोचती है कि तू कौन है?
(गाय सिर हिलाती है और जुगाली करती रहती है। देव मुस्कुराता है।)
देव: हां, मैं जानता हूं तेरा जवाब। तू कहेगी, "मैं गाय हूं। मैं दूध देती हूं। मैं मां हूं।" लेकिन ये तो तेरा काम है, तेरी पहचान है। अगर तू दूध न देती तो क्या तू गाय नहीं रहती? तब तू क्या होती?
(अचानक कैमरा बांस पर जूम करता है। हवा चलती है और बांस हिलता है, जैसे वह बोल रहा हो।)
देव (बांस की ओर देखते हुए): देख... ये बांस। इसको किसी ने जमीन से उखाड़ा, यहां लाकर गाड़ दिया। इसने कभी नहीं पूछा कि "मुझे यहां क्यों लाए?" बस खड़ा है। कभी इससे कोई बैल बांध देता है, कभी कोई कपड़ा सुखा देता है। कभी-कभी त्योहार पर इस पर झंडा लगा देते हैं। सब इसका इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह पूछता नहीं।
(देव खड़ा होता है और बांस के पास जाता है। उस पर हाथ रखता है।)
देव (वॉयस ओवर): मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं। ना ही कोई लेखक, ना ही कोई रचनाकार जो रच सके कोई रचना जो हो अद्भुत, अकल्पनीय, जो रचयिता को पसंद हो। परंतु मैं हूं एक चिंतन। मैं हूं एक सड़क जो सकता है अपने जीवन को अपने ही मृदुल मदन से, अपने ही ध्वनि धन से, अपने ही चिंतन मनन से। है... मैं हूं। मैं हूं इंसान। मैं हूं मनुष्य। मैं हूं कोई आत्मा। मुझे क्या पता?
(देव बांस से पीठ टिकाकर बैठ जाता है। सूरज की पहली किरण उसके चेहरे पर पड़ती है।)
देव (गौरी से): गौरी... आज तुझे एक कहानी सुनाता हूं। एक बेताल की। और एक विक्रम की। लेकिन मेरी कहानी में बेताल पीछे नहीं लगा, बेताल तो विक्रम के अंदर ही बैठा था। और विक्रम... विक्रम कोई राजा नहीं, बस एक आदमी था। जिसका नाम था... देव।
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दृश्य 2: पहला प्रश्न - मैं कौन हूं? (8-16 मिनट)
स्थान: वही पीपल का पेड़। अब धूप थोड़ी तेज हो गई है। देव गाय को चारा डाल रहा है।
(गाय रंभाती है। देव जैसे उसकी आवाज का अनुवाद करने लगता है। यह एक काल्पनिक संवाद है।)
गाय (देव की कल्पना में आवाज): देव... तू कहता है मैं नहीं जानती कि मैं कौन हूं। लेकिन तू खुद जानता है क्या? तूने कभी अपने आप से पूछा?
देव: (हंसते हुए) पूछा है। हर रोज पूछता हूं। जब सुबह उठता हूं और आईने में देखता हूं तो लगता है ये चेहरा मेरा नहीं है। ये तो बस एक मुखौटा है जो दुनिया को दिखाने के लिए पहन लिया है। अंदर कुछ और है।
गाय: क्या है अंदर?
देव: (गहरी सांस लेकर) एक खालीपन। लेकिन वो खालीपन खाली नहीं है। उसमें कुछ भरा है। सवाल भरे हैं। जैसे किसी ने मुझे बिना बताए यहां ला दिया। जैसे उठाकर खड़ा कर दिया हो किसी बांस को किसी त्रिपाल के शामियाने में। जब लोग ठंड से बचने के लिए आगे बढ़ते हैं तो उस बांस को देखकर समझ जाते हैं कि यहां रास्ता है। पर बांस को कौन पूछता है कि उसे ठंड लग रही है या नहीं?
गाय: तो तू बांस है?
देव: हां... और नहीं भी। मैं बांस की तरह हूं। खड़ा हूं। सब मुझे देखकर अपनी राह समझ जाते हैं, पर मुझे कोई नहीं समझता। मैं हूं क्या? मुझे भी नहीं पता। पर आपके बीच में हूं। इसलिए हूं। क्योंकि मैं आत्मा हूं। मैं हूं। मैं धर्मेन्द्र हूं... नहीं, मैं देव हूं। मेरा नाम क्या है? मैं हूं क्या?
(अचानक दूर से एक बच्चे की हंसी सुनाई देती है। देव मुड़कर देखता है। एक छोटा बच्चा भागता हुआ आता है और बांस के पास रुकता है।)
बच्चा: अंकल! ये बांस क्यों खड़ा है?
देव: (मुस्कुराकर) क्योंकि इसको खड़ा कर दिया गया।
बच्चा: किसने?
देव: किसी ने। तूने अपने घर के बाहर वो पुराना स्टूल देखा है? उसको भी किसी ने वहां रख दिया। अब वो वहीं है।
बच्चा: तो ये बांस उदास नहीं होता?
देव: नहीं। क्योंकि ये सवाल नहीं पूछता। जो सवाल नहीं पूछता, वो उदास नहीं होता। जो पूछता है... वो या तो पागल हो जाता है या फिर... बुद्ध।
(बच्चा भाग जाता है। देव गाय की ओर देखता है।)
देव: गौरी... मैं पागल हूं या बुद्ध?
गाय: (देव की कल्पना में) न पागल, न बुद्ध। तू तो बस 'है'।
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दृश्य 3: दूसरा प्रश्न - नाम और पहचान (16-24 मिनट)
स्थान: गांव के बाहर एक छोटी सी दुकान। देव चाय पी रहा है। गाय पास में बंधी है।
(दुकानदार देव से बात करता है।)
दुकानदार: देव भैया, आजकल दिखते नहीं। कहां रहते हो?
देव: यहीं तो हूं।
दुकानदार: मतलब? गांव में ही तो रहते हो ना?
देव: नहीं, मतलब 'यहीं'। जहां तुम देख रहे हो, वहीं।
(दुकानदार हैरान होकर उसे देखता है और चाय बनाने लगता है।)
(देव का वॉयस ओवर शुरू होता है।)
देव (वॉयस ओवर): आप जानते हैं आप कौन हैं? बताइए ना... आप कौन हैं? आपका नाम है? मेरा नाम ऐसे ही यहां... जैसे विक्रम के पीछे बेताल पड़ जाता है और बच्चे से लग जाता है। जो उमंग है, जो आनंद है, जो पल है... जो नहीं भी है।
(दृश्य बदलता है। देव गाय के साथ एक तालाब के किनारे बैठा है। शाम का समय।)
देव (गौरी से): गौरी... आज दुकानदार ने पूछा "कहां रहते हो?" मैंने कहा "यहीं।" वो समझा नहीं। लोग समझते क्यों नहीं? हम अपने नाम में, अपने घर में, अपने काम में इतने बंधे हैं कि उससे परे देख ही नहीं पाते।
गाय (कल्पना में): तू समझा क्या?
देव: थोड़ा सा। देख, जब मैं कहता हूं "मैं देव हूं", तो यह मेरा नाम है। लेकिन क्या यह नाम मैं हूं? अगर कोई मुझे पुकारे "अरे बांस!" तो क्या मैं बांस हो जाऊंगा? नहीं ना। तो मैं नाम नहीं हूं।
गाय: तो फिर क्या है?
देव: एक एहसास। एक मौजूदगी। एक 'होना'। जैसे यह हवा है। इसका कोई नाम नहीं, कोई रूप नहीं, पर है। और जब यह चलती है तो पत्ते हिलते हैं, पानी में लहरें उठती हैं। मैं भी कुछ ऐसा ही हूं।
(देव पानी में कंकड़ फेंकता है। लहरें उठती हैं।)
देव: देख, यह लहर कितनी देर रहती है? बस एक पल। और फिर पानी में समा जाती है। हमारा जीवन भी ऐसा ही है। हम सोचते हैं हम लहर हैं, पर हम तो पानी हैं। लहर तो बस एक अभिव्यक्ति थी।
गाय: तो तू पानी है?
देव: हां... और नहीं भी। पानी तो बस एक रूपक है। मैं वह हूं जो सब रूपों में बहता है, पर किसी रूप में बंधता नहीं। यही तो चिंतन है। यही मनन है। इसी से जीवन सकता है... सकता है अपने ही मृदुल मदन से, अपने ही ध्वनि धन से।
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दृश्य 4: तीसरा प्रश्न - कर्ता और कर्म (24-32 मिनट)
स्थान: रात का समय। देव की झोपड़ी के बाहर अलाव जल रहा है। देव और गाय आमने-सामने बैठे हैं। चारों ओर सन्नाटा।
(देव अलाव में लकड़ी डालता है। चिंगारियां उड़ती हैं।)
देव: गौरी... एक बात समझ में नहीं आती। लोग कहते हैं "मैंने यह किया, मैंने वह किया।" जैसे किसी बड़े काम के लिए उनको श्रेय चाहिए। पर जब कोई गलती होती है तो कहते हैं "भगवान की मर्जी" या "किस्मत खराब थी।" यह दोहरा मापदंड क्यों?
गाय (कल्पना में): क्योंकि इंसान का 'मैं' बहुत मजबूत है। उसे अपने होने का अहसास कराने के लिए कुछ करना पड़ता है।
देव: लेकिन मैंने तो कुछ नहीं किया। न मैं कोई लेखक हूं, न रचनाकार। मुझे तो जबरदस्ती यहां ला दिया गया है। जैसे किसी ने उठाकर खड़ा कर दिया हो। मैंने कोई रचना नहीं लिखी जो अद्भुत हो, अकल्पनीय हो, जो रचयिता को पसंद हो। मैं तो बस... हूं।
गाय: तू कहता है कि तूने कुछ नहीं किया, फिर भी तू है। तो 'होना' कोई कर्म नहीं है?
देव: (सोचता है) शायद 'होना' ही सबसे बड़ा कर्म है। जब तू यहां है, तब तू कुछ न कुछ कर ही रहा है। सांस लेना भी एक कर्म है। सोचना भी। लेकिन यह कर्म 'मैं' नहीं कर रहा। यह तो बस हो रहा है।
(एक उल्लू बोलता है। देव ऊपर देखता है।)
देव: सुन, उल्लू बोला। क्या उसने सोचा कि "मैं बोलूंगा"? नहीं। वह बस बोला। जैसे फूल खिलता है, बिना यह सोचे कि "मैं खिलूंगा।" जैसे नदी बहती है, बिना यह सोचे कि "मैं बहूंगी।" तो मैं भी जो कुछ कर रहा हूं, वह बस हो रहा है। मैं कर्ता नहीं हूं।
गाय: तो फिर दुख क्यों होता है?
देव: क्योंकि हम 'कर्ता' बनना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि जो हो, वह हमारी मर्जी से हो। और जब हमारी मर्जी से नहीं होता तो दुख होता है। अगर हम मान लें कि सब कुछ बस 'हो रहा है', तो न सुख रहेगा, न दुख। बस एक शांत 'होना' रह जाएगा।
(देव गाय के माथे पर हाथ रखता है। गाय की आंखें बंद हो जाती हैं।)
देव: यही तो उमंग है। यही आनंद है। यही वह पल है... जो नहीं भी है।
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दृश्य 5: चौथा प्रश्न - अंत और अनंत (32-38 मिनट)
स्थान: सुबह का समय। वही पीपल का पेड़ और बांस। देव बांस के पास खड़ा है। गाय बैठी है।
(देव बांस को छूता है।)
देव: गौरी... यह बांस एक दिन सड़ जाएगा। गिर जाएगा। मिट्टी में मिल जाएगा। तब यह क्या होगा?
गाय (कल्पना में): मिट्टी।
देव: हां। लेकिन क्या तब यह 'नहीं' होगा? नहीं। यह था, अब नहीं है, पर इसका 'होना' तो समय की किताब में दर्ज हो गया। एक बार जो हो गया, वह कभी 'नहीं' नहीं हो सकता। वह बस रूप बदल लेता है।
गाय: तो मैं जब मर जाऊंगी, तब भी रहूंगी?
देव: हां। तू मेरी यादों में रहेगी। इस हवा में रहेगी। उस घास में रहेगी जो तेरे गोबर से उगेगी। तू हर जगह रहेगी। बस 'गाय' के रूप में नहीं।
(एक बूढ़ा आदमी लाठी टेकता हुआ आता है। वह देव को देखकर रुकता है।)
बूढ़ा: बेटा, यह बांस किसका है?
देव: किसी का नहीं। सबका है।
बूढ़ा: मैं इसे ले जाऊं? अपनी झोपड़ी की छत के लिए।
देव: ले जाओ बाबा। पर यह बांस अब बांस नहीं रहेगा। यह छत बन जाएगा।
(बूढ़ा बांस उखाड़कर ले जाता है। देव और गाय देखते रहते हैं।)
देव (वॉयस ओवर): देख गौरी... यह बांस गया। अब यहां एक गड्ढा है। कल कोई इस गड्ढे में पौधा लगा देगा। वह पौधा बढ़ेगा और फिर एक दिन बांस बन जाएगा। यही तो चक्र है। इसी चक्र में मैं हूं। मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं... न ही कोई लेखक, न रचनाकार। मैं तो बस एक चिंतन हूं। एक सड़क हूं। एक मनुष्य हूं। एक आत्मा हूं।
(देव गाय के पास बैठ जाता है और उसे गले लगा लेता है।)
देव: और तू मेरी सोलमेट है। क्योंकि तू सवाल नहीं पूछती, पर मेरे सवालों के जवाब देती है। तू बोलती नहीं, पर मुझसे बातें करती है। तू है... बस 'है'।
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दृश्य 6: समापन - मैं हूं (38-45 मिनट)
स्थान: वही झोपड़ी के बाहर। रात का समय। पूर्णिमा का चांद। देव गाय के पास लेटा हुआ है। गाय बैठी है और जुगाली कर रही है।
(देव आसमान की ओर देखता है।)
देव: गौरी... आज चांद पूरा है। कल से घटने लगेगा। फिर एक दिन बिल्कुल गायब हो जाएगा। फिर धीरे-धीरे बढ़ेगा। यह सब चल रहा है। मैं भी इसी में हूं।
(वह चुप हो जाता है। कुछ देर बाद बोलता है।)
देव: मुझे अब कोई सवाल नहीं पूछना। मुझे जवाब भी नहीं चाहिए। मुझे बस यह 'होना' चाहिए। जैसे यह चांद है। जैसे यह हवा है। जैसे यह गाय है। जैसे मैं हूं।
(वह आंखें बंद कर लेता है। गाय उसके चेहरे को सूंघती है।)
देव (धीमी आवाज में): ॐ...
(स्क्रीन पर धीरे-धीरे शब्द उभरते हैं, जैसे कोई लिख रहा हो।)
"मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं।
ना ही कोई लेखक, ना ही कोई रचनाकार।
जो रह सकता है कोई रचना जो हो अद्भुत, अकल्पनीय।
जो रचयिता को पसंद हो।
परंतु मैं हूं एक चिंतन।
मैं हूं एक सड़क।
जो सकता है अपने जीवन को अपने ही मृदुल मदन से।
अपने ही ध्वनि धन से।
अपने ही चिंतन मनन से।
है... मैं हूं।
मैं हूं इंसान।
मैं हूं मनुष्य।
मैं हूं कोई आत्मा।
मुझे क्या पता।
मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं।
ना वही कोई रचना लिख सकता हूं।
मुझे तो जबरदस्ती यहां ला दिया गया है।
जैसे उठाकर खड़ा कर दिया हो किसी बांस को किसी त्रिपाल के शामियाने में।
जब वह खड़ा रहता है, ठंड लोगों से बचकर, आगे बढ़ते हैं।
या उसके सहारे खड़े हो जाते हैं।
या उसको देखकर समझ जाते हैं।
मैं इस बांस की तरह हूं।
मैं हूं क्या?
मुझे भी नहीं पता।
पर आपके बीच में हूं।
इसलिए हूं।
क्योंकि मैं आत्मा हूं।
मैं हूं।
मैं धर्मेन्द्र हूं।
मेरा नाम क्या है?
मैं हूं क्या?
आप जानते हैं?
आप कौन हो?
आप जानते हैं क्या?
बताइए ना... आप कौन हैं?
आपका नाम है?
मेरा नाम ऐसे ही यहां...
जैसे विक्रम के पीछे बेताल पड़ जाता है।
और बच्चे से लग जाता है।
जो उमंग है।
जो आनंद है।
जो पल है।
जो नहीं भी है।"
(स्क्रीन फेड टू ब्लैक। केवल गाय की घंटी की आवाज़ और दूर से आती हुई "ॐ" की ध्वनि।)
स्क्रीन पर आखिरी लाइन उभरती है:
"जब सवाल खत्म हो जाते हैं, तो जो बचता है... वही मैं हूं।"
- धर्मेन्द्र
(समाप्त)
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