वो स्वयं को रचिता समझ बैठी हैं।
वो अपनी आवाज को बुलंद करने के माध्यम से अपने चरित्र को किसी अन्य प्रकार से व्यक्त करने में मस्त।
दुनिया एक तरफ अस्त होने को हैं , किंतु महिलाओं का आचरण वैसे हैं जैसे उनकी अकल पागल हाथी जैसे हो गई हैं।
कारण बढ़ती हुई विकृत मानसिकता हैं।
समाज में बड़का बदलाव क्यूं आया हैं ये मैगनेटिक या टेक्निकल फॉल्ट नही हैं।
वो स्वयं को रचिता समझ बैठी हैं।
इसका अंत कब होगा , गीता के माध्यम से बताना चाहुंगा ।
जिनको अपनी नाक और कान किसी ने और साफ करना सिखाया हो वो सीट पे बैठ कर अपने आप को इंद्रा गांधी समझ बैठी हैं।
जा तेरा भी अंत ऐसे हो।
कष्ट की बात ये हैं , जिन मां बहनों की रक्षा के लिए सारी उमर लड़ते रहे आज एक विकृत मानसिकता वाली लड़की हाथ के इशारे से हमको दूर हटने के लिए कहती है जैसे कोई मर्द कुत्ता हो।
राम ही मालिक है ऐसे लोगो का।
हम तो अपने राह चले जायेंगे , इस वृतान्त का यही अंत करते हैं अथवा दिल पे लेके उसको जवाब दें।
क्या करें।
जय सिया राम।
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