मैं कोई कवि, नहीं वह भी नहीं हूं।
मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं ना ही कोई लेखक ना ही कोई रचनाकार जो रह सकता है कोई रचना जो हो अद्भुत अकल्पनीय है जो रचयिता को पसंद हो परंतु मैं हूं एक चिंतन मैं हूं एक सड़क जो सकता है अपने जीवन को अपने ही मृदुल मदन से अपने ही ध्वनि धन से अपने ही चिंतन मनन से है मैं हूं हूं इंसान मैं हूं मनुष्य में हूं कोई आत्मा मुझे क्या पता मैं कोई कभी वह भी नहीं हूं ना वही कोई रचना लिख सकता हूं मुझे तो जबरदस्ती यहां ला दिया गया है जैसे उठाकर खड़ा कर दिया हो किसी बंबू को किसी ट्रिपल के शाह रे किसी आयोजन में जब वह खड़ा रहता है ठंड लोगों से पड़कर आगे बढ़ते हैं या उसके सारे खड़े हो जाते हैं या उसको देखकर समझ जाते हैं मैं इस बंबू की तरह हूं मैं हूं क्या मुझे भी नहीं पता पर आपके बीच में हूं इसलिए हूं क्योंकि मैं आत्मा हूं मैं हूं मैं धर्मेंद्र हूं मेरा नाम क्या है मैं हूं क्या आप जानते हैं आप कौन हो आप जानते हैं क्या बताइए ना आप कौन है आपका नाम है मेरा नाम ऐसे हूं यहां जैसे विक्रम के पीछे बेताल पड़ जाता है और बच्चे से लग जाता है जो उमंग है जो आनंद है जो पल है जो नहीं भी