आत्मबोध

#काशी: जहाँ संन्यास की चाह 'आत्मबोध' में बदल गई...

यह बात फरवरी 2022 की है। मन में वैराग्य का भाव था और लक्ष्य था— संन्यास। मैं अपने मार्गदर्शक डॉ. उपेन जी और कुछ मित्रों के साथ मोक्ष की नगरी काशी के लिए निकल पड़ा।

काशी की उन गलियों और घाटों में एक अजीब सा सुकून था। हमने मणिकर्णिका घाट की अनंत अग्नि देखी, गंगा आरती की दिव्यता में खोए और महादेव की भक्ति में सराबोर हुए। रात विश्राम के बाद, अगला दिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन होने वाला था—मेरे संन्यास की दीक्षा का दिन।

वो एक पल और बदलती सोच संन्यास की सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। औपचारिकताएं शुरू होने से पहले, मैं कुछ देर अकेले माँ शीतला घाट' (जो मेरा कुलदेवी घाट भी है) पर जाकर बैठ गया। लहरों की आवाज और काशी की उस पवित्र हवा में अचानक मेरा साक्षात्कार स्वयं से हुआ।

मेरे भीतर से कई सवाल उठे और तभी अंतर्मन से एक जवाब आया:

"अभी बहुत काम बाकी है... समाज के लिए, देश के लिए और अपनों के लिए।"

उस क्षण मुझे आत्मबोध' हुआ कि संन्यास केवल गेरुए वस्त्र धारण करने में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाने में है। मैंने एक गहरी और सुखद सांस ली, अपने निर्णय को बदला और वापस अपने लोगों के बीच आ गया।

४ साल का अद्भुत सफर

उस घटना को आज 4 साल बीत चुके हैं। इन सालों में मैंने ढेरों यात्राएं कीं, दुनिया को करीब से देखा और जो अनुभव प्राप्त किए, वे किसी चमत्कार से कम नहीं थे। काशी ने मुझे संन्यासी तो नहीं बनाया, लेकिन मुझे 'स्वयं' से जरूर मिला दिया।

काशी वह स्थान है जहाँ स्वयं भगवान शिव और माँ उमा वास करते हैं।** वहाँ की महिमा शब्दों में बयान करना नामुमकिन है।

🚩 मेरा सुझाव: यदि जीवन के किसी मोड़ पर उलझन में हों, तो एक बार काशी जरूर जाएं। जो वहां जाकर महसूस होता है, वह कहीं और नहीं मिलेगा।

हर हर महादेव!
धर्मेंद्र

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