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यात्रा २२.०४.२०२४

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हवा को चिरती एक मक्खी, जिसे न धर्म का पता न ही धम्म का मक्खी निरंतर अपने पंखोंसे विजार जैसे पहाड़ वाली व्यार से लड़ रही हैं। एक मक्खी की कितनी मुस्कले हैं आज तक या तो मक्खी जानती हैं या उसके पंख।