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Showing posts from July, 2026

यान्ति देवव्रता देवान्‌ पितृन्‌ यान्ति पितृब्रताः।भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌ ॥ (९।२५)

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सरला-- आजकल स्त्रियाँ जो अनेक पीर-पैगम्बर, लकड़हा, चिथड्हा, बाघोबा, मालासी, रिगतिया और मावली आदि अनेक देवी-देवताओंकी पूजा करती हैं वह सब भी तो इसी देवपूजामें है! सावित्री--तुम समझी नहीं, देवता तो उनको कहते हैं कि जिनका शास्त्रोंमें वर्णन है, तुमने जो नाम बतलाये हैं उनमेंसे कोई भी देवता नहीं है। मुसलमानोंके पीर-पैगम्बरोंको मानना तो महान्‌ अधर्म और पापकार्य है। हिन्दुओंके इतने देवी-देवताओंके रहते हिन्दूधर्मका नाश करनेवाले मुसलमानोंके पीर-पैगम्बरोंको मानना, उनकी पूजा करना, मानना, बोलना, कब्रोंको पूजना, ताजियोंके नीचेसे निकलना और बालकोंको निकलवाना, छोटे- छोटे बच्चोंपर मुसलमानोंके मुँहसे थुकवाना, उनकी कब्रोंपर फूल, पैसे और बतासे चढ़ाना और फिर उनका जूठन प्रसाद मानकर लेना तो एक प्रकारसे हिन्दूधर्मपर आघात करना है। अतएव इनकी पूजा तो सर्वथा त्याज्य है, परंतु उन लकड्हा और मालासी आदिकी पूजा भी धर्मसंगत नहीं । उनकी पूजा भी एक तामसी कार्य है और प्रेतोपासना है और इस प्रकारकी पूजाका फल क्या होता है, इसके लिये गीतामें कहे हुए भगवान्‌के वचनोंपर ध्यान दो- यान्ति देवव्रता देवान्‌ पितृन्‌ यान्त...

संस्कृत में अपना परिचय देने के लिए

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संस्कृत में अपना परिचय देने के लिए, आप कह सकते हैं: "मम नाम (आपका नाम) अस्ति।" इसके बाद, आप अपना परिचय देना जारी रख सकते हैं, जैसे: "अहं (शहर/गांव) में निवासामि।"  संस्कृत में "मम नाम (आपका नाम) अस्ति" का अर्थ है "मेरा नाम (आपका नाम) है।"  उदाहरण के लिए:  "मम नाम आदित्या अस्ति।": (मेरा नाम आदित्या है) "मम नाम सुरेशः अस्ति।": (मेरा नाम सुरेश है) "मम नाम रश्मी अस्ति।": (मेरा नाम रश्मी है) आप अपने पिता, माता, मित्र, और अन्य जानकारी के बारे में भी संस्कृत में बता सकते हैं:  "मम पितुः नाम (पिता का नाम) अस्ति।" (मेरे पिता का नाम (पिता का नाम) है) "मम मातुः नाम (माता का नाम) अस्ति।" (मेरी माता का नाम (माता का नाम) है) "मम मित्रस्य नाम (मित्र का नाम) अस्ति।" (मेरे मित्र का नाम (मित्र का नाम) है) आप यह भी बता सकते हैं कि आप कहाँ रहते हैं, कहाँ पढ़ते हैं और आपको क्या पसंद है:  "अहं (शहर/गांव) में निवासामि।": (मैं (शहर/गांव) में रहता हूँ) "अहं (विद्यालय का नाम) में पठामि।...

इंद्रप्रस्थ

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यहाँ पांडवों के इंद्रप्रस्थ राज्यकाल पर आधारित अगले १० हिंदी पोस्ट हैं। प्रत्येक लगभग ३०० शब्दों का है, महाभारत (विशेषकर सभा पर्व) के प्रमाणों पर आधारित। हर पोस्ट में प्रमुख प्रमाण ग्रंथ/पर्व का नाम दिया गया है। पोस्ट १: इंद्रप्रस्थ में धर्म पर आधारित शासन पांडवों के इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर का शासन पूर्णतः धर्म पर टिका था। धर्मराज युधिष्ठिर प्रजा के हित को सर्वोपरि मानते थे। सभा पर्व में वर्णन है कि वे प्रजा की रक्षा, न्याय, और सत्य के पालन में अटल थे। राज्य में कोई अन्याय नहीं होता था; राजा स्वयं प्रजा की सुनवाई करते और कमजोरों की रक्षा करते। भीम की शक्ति, अर्जुन की वीरता, नकुल-सहदेव की बुद्धि से राज्य मजबूत था। राजसूय यज्ञ के बाद इंद्रप्रस्थ की प्रसिद्धि फैली, जो धर्म-आधारित शासन की सफलता दर्शाती है। प्रमाण: महाभारत सभा पर्व (राजसूय पर्व)। प्रजा सुखी थी, व्यापार बढ़ा, और राज्य स्वर्ग-सदृश बन गया। युधिष्ठिर का धर्म ही राज्य की नींव था, जहाँ सभी वर्ण सहयोग से रहते थे। (शब्द: ~३००) पोस्ट २: इंद्रप्रस्थ की दंड व्यवस्था इंद्रप्रस्थ में दंड व्यवस्था कठोर लेकिन न्यायपूर्ण थी। ...

शीर्षक: तुमसे जुदा न होंगे हम

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बिल्कुल, ये रही देव और एजे की ऑफिस लव स्टोरी, हिंदी में, आपके दिए गए अंदाज़ और तारीखों के साथ। --- शीर्षक: तुमसे जुदा न होंगे हम किरदार: · देव: ऑफिस का शांत, समझदार और मेहनती यंग मैनेजर। · एजे (AJ): ऑफिस की हंसमुख, एनर्जेटिक और सबकी मदद करने वाली टीम मेंबर। --- अध्याय 1: 9 फरवरी, 2026 - जसोला मूवी इनॉक्स ऑफिस में दोनों सिर्फ ‘हैलो-हाय’ तक ही सीमित थे। देव टीम लीड था, एजे उसी की टीम में जूनियर। उस दिन शनिवार था। देव अपने दोस्तों के साथ 'बॉर्डर' फिल्म देखने जसोला सिनेमा पहुंचा। अचानक टिकट काउंटर पर उसकी नज़र एजे पर पड़ी। देव (मन में): "ये एजे? यहाँ?" वह अकेली थी, थोड़ी परेशान। सब शो हाउसफुल थे। एजे: "एक टिकट मिलेगा क्या? 'बॉर्डर' का?" काउंटर वाले ने मना कर दिया। तभी देव ने आवाज़ लगाई। देव: "एजे! तुम यहाँ?" एजे (चौंककर): "देव सर! मैं... फिल्म देखने आई थी, लेकिन टिकट नहीं है।" देव ने अपना एक्स्ट्रा टिकट उसकी ओर बढ़ा दिया। उसके दोस्त ने शरारत से आँख मारी। देव: "चलो साथ में बैठते हैं। 'बॉर्डर' अकेले देखने में मज...

महाकुंभ

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जब बृहस्पति आकाश में 30 Degree के बारह विभाजनों में से दूसरे भाग में 17 Degree पर पहुँच कर सूर्य के आकाश में 271 Degree के कोण में प्रवेश करके 23.5 Degree के कोण पर झुकी धरती पर अपनी किरणों को दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की ओर ले जाना प्रारंभ करता है उस मकर संक्रांति पर्व पर महाकुंभ के प्रथम अमृत स्नान पर हार्दिक शुभकामनाएँ।  हिन्दू धर्म की महान वैज्ञानिकता के इस पर्व पर गर्व करें व ऋषियों के ज्ञान को नमन करें व धरती को स्थिर व चपटी बताने वालों द्वारा भारतीय संस्कृति को अवैज्ञानिक कहने के चपटे व जड़ प्रभाव से बचें। This is a great Astronomical Festival no parallel in world celebrated in different regions by different names but true Atma is same.

यात्रा ०२.०७.२०२४

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"काल" सबकी अपनी गति हैं उसी गति को आज की भाषा में समय कहते हैं, आज से लगभग १०००० वर्ष पहले काल गति माने की समय की गति का वर्णन हमे भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथो में मिलता हैं, लेकिन दुर्भाग्य हैं की , इसी काल की गति में वो सब नष्ट हो गए किसी आतंकी की सोच के कारण, फिर भी भारत की उस प्राचीन संस्कृति को श्रुति एवम् स्मृति से पुनः जन जन तक पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य हुए, आई के परिपेक्ष में कहे समय बहुत मूल्यवान हैं किंतु पूर्व में इससे अधिक कही महत्वपूर्ण माना गया था, अगर आप आज से ४० वर्ष पूर्व में जाएं तो आपको मिल जाएगा लोग हर के काम करने से पहले समय यानी काल की चाल वो खगोलीय ग्रहों की स्थिति से अपने जीवन का यापन करते थे। आज केवल इतना अंतर हैं की सब कुछ आसान हैं , परंतु कल नहीं था ओर न ही कल होगा क्योंकि यह काल हैं अपनी गति से चलता हैं। और उसकी गति सामान्य नहीं हैं जैसे जो कल शिशु था आज वो वयस्क हैं और जो वयस्क थे आज वृद्ध, वृद्ध प्रकृति में समलित हो गए हैं काल जीवन में बहुत ही मायने रखता हैं। तो काल और महाकाल के बीच में मानव हैं और ये सारा संसार। अंत में य...

प्रकृति संस्कृति का निर्माण करती है। संस्कृति मूल्यों को आकार देती है। मूल्य भविष्य निर्धारित करते हैं।

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“प्रकृति संस्कृति का निर्माण करती है। संस्कृति मूल्यों को आकार देती है। मूल्य भविष्य निर्धारित करते हैं।”

यात्रा २३.०४.२०८१

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सभी चमक धमक के अपने ह्रदय को कोमल बना कर चल दिए, जाना था मंदिर जहा विराजमान हैं, परम भक्त श्री हनुमान जो भक्ति के सागर हैं भगवान राम नाम जाप में ध्यानरत रहते हैं सदेव, आज उनकी जयंती हैं समाज का के बड़ा वर्ग उनके आशिर्वाद को आतुर मंदिर मंदिर लाइन में लगा हैं। कहते है न ना जाने किस रूप में हरी मिल जायेंगे। आज अनुभव का दिन हैं अपनी ऊर्जा बढ़ाने का दिवस हैं सभी साधक लग गए हैं अपनी ऊर्जा को और शक्ति और गति देने में। भगवान सबकी रक्षा करते हैं। जय श्री राम।

यात्रा २२.०४.२०२४

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हवा को चिरती एक मक्खी, जिसे न धर्म का पता न ही धम्म का मक्खी निरंतर अपने पंखोंसे विजार जैसे पहाड़ वाली व्यार से लड़ रही हैं। एक मक्खी की कितनी मुस्कले हैं आज तक या तो मक्खी जानती हैं या उसके पंख।

Delhi Metro 10.04.2024

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आज मेट्रो में जब मैं ५२ से आगे की मेट्रो के लिए जा रहा था तभी मेट्रो में बैठे दो युवक मुझे देख के हस रहे थे, क्योंकि में अपनी जगह में खड़े होकर अपने इष्ट मन ही मन भज रहा था,  वो क्यों मेरा उपहास कर रहे थे नही पता , मेरे कद को देख कर, मेरे वस्त्र को देख कर, मेरे माथे पे लगे तिलक को देख कर अथवा किसी अन्य कारण से। मेने उन्हे घूरते हुए नाराजगी जताने की कोशिश की फिर भी नहीं माने, मैं उनको मूर्ख कहूं या ये सोचते हुए अपसोस करूं की कुछ नहीं कह सका उनको कोईकी मुसझे अधिद मजबूत दिख रहे थे, राम जाने , अब तो ये पीड़ा एक समय के बाद ही जाएगी, काश हमारे शार्प देने की शक्ति आज भी काम करती, डर ही आनंद लेते समय यह मार्ग दिखाता हैं की ये अनुचित हैं या उचित। राम मेरी पीड़ा को दूर करें।

शब्दों से प्रेम किया हमने

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अब मिलकर उनसे कुछ कहते कब तक यूँ भला तुम चुप रहते इक उम्र बिता दी राह तके पर इरादे थे जो नहीं थके मन ही मन में न जाने कितनी बातें कह डाली, संपर्क सूत्र तो बना नहीं निर्झर सी रही सूखी नाली, अब निश्चय प्रेम जता पाते वो स्तब्ध भले मिलने आते!! उनकी हस्ती कुछ ऐसे थी कुछ हम जैसी कुछ कैसी थी कुछ हम भी बयां कर पाते  पर्दों पे परदे थे, पर्दों से परदा शायद उठा पाते वो स्तब्ध भले मिलने आते!! मनाने का हुनर हमें आता कहाँ से वो तो गैर की झलक से बिन मनाये ही मान जाते श्वेत चंद्र से हमें दिखते थे दूर से ही सही, खूब रिझाते इक दिन चांदनी में दिखे वो आसमान किसी और को उढ़ाते शब्दों से प्रेम किया हमने पर शब्द लिखें, न बुने, न कहे न सुने उनने, उनकी भी क्या खता बताते अब निश्चय प्रेम जता पाते वो स्तब्ध भले मिलने आते!!

एक ही ईश्वर हैं

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आचार व्यवहार में हैं, इन सबके पीछे क्या हैं ?  इष्ट हैं अनिष्ट हैं ?  वृत्ति का निरोध करता हैं ? अनपढ़, पढ़ लिख कर अपनी जड़ों से कटना ही अनपढ़ता हैं । चित भूमि,  इंसान का हक जानवर से ऊपर कैसे ? ये हमारा संस्कार नहीं, आलंबन, दो ज्ञान की पद्धति है ,  हमारी जो संस्कृति हैं वो ज्ञान की संस्कृति हैं,  ज्ञान तो सीमित हो गया , आधुनिक युग में। जो गंदगी दूर करता हैं वो जल कैसे गंदा हो सकता हैं। लोग अपने ध्येय में नहाते हैं। फ्रीडम फ्राम वांट फ्रीडम तो क्रिएट सरप्लस  मूल में भेद हैं,  १ सेंचुरी में शास्त्र का बोल बाला था। स्पार्कल ऑफ़ divin हैं, पुरुष एवम् परकृति ही ब्रम्भ हैं। एक ही ईश्वर हैं ,  निराकार  हैं पर निर्गुण नही हैं, अभ्र्ममिक गॉड अभियान चलाया की आशा के बिना बिज का उत्सर्जन नहीं किया जा सकता है , तत्वमसी के मायने इस परकार बदल जाते हैं जब जीव अपने भीतर से न देखते हुए मन की द्वारे बनाए गए आडंबर में फसा हो।

तंत्र

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भारत में, सूर्य की प्रात: पूजा कोर्नकांक में,  मध्यान की कौशल में, और शाम की पुजा मुल्तान में।

रमंति इति रामः।

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रमंति इति रामः।  जो रोम रोम में कण कण में रमता है वही राम है।  श्री राम भगवान,  जिन्होंने त्रेता युग में सत युग से बदलते मानव मूल्यों को स्थापित करने हेतु अवतार लिया । मानवता के नए आदर्श प्रस्तुत करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम को अनेक कष्ट झेलने पड़े पर प्रभु कभी विचलित नहीं हुए कभी आसान मार्ग नहीं अपनाया।  राम सबके हैं। भगवान राम का चरित्र इस प्रकार का है कि यह आग्रहपूर्वक अपने को परम्परासम्मत और मर्यादित रखता है। आज कुछ लोगों के लिए परम्परासम्मत होना दक़ियानूसी है, लेकिन यह समाज की व्यवस्था और अनुशासन या जिसे रामराज्य कहते हैं,  उसकी बुनियाद है। परम्परा के साथ होना प्रतिगामी होना नहीं है । #परम्परा हमारे सदियों के अनुभव और अभ्यास से बने मूल्यों का जीवन्त समूह है और इसके साथ होने का मतलब अपने को निरन्तर जीवन्त और अद्यतन रखना है । परम्परा राम के आचार-विचार में जीवन्त है- यह उनकी वाणी में है,  और यह उनकी जिह्वा पर है। जब वे कुछ कहते हैं, तो लगता जैसे परम्परा जीवन्त रूप में अपना मन्तव्य हमारे सामने रख रही हो। यह परम्परा ठहरी हुई परम्परा नहीं है, य...

कितनी भी प्रशंसा करो कम है।

एक ऐसा मंदिर जिसकी सुंदरता का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता है। कितनी भी प्रशंसा करो कम है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित गोपेश्वर मंदिर में जरूर जाना जाके देखना चाहिए। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। प्राचीन तीर्थ मंदिरों में से एक है।मंदिर में वास्तु कला के द्वारा इसका ऐसा सुंदर और अद्भुत निर्माण किया गया है। जिससे देखते हुए मन नही भरता है। मंदिर में सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाला है इसका स्वर्गमंडप । यह एक गोलाकार स्तंभ है जो 48 स्तंभों द्वारा बना है। इन स्तंभों अलग अलग देवताओं से अलंकृत किया गया है। इसमें 12 राशिया भी शामिल हैं । ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा स्वर्गमंडप के केंद्र में पूरी तरह से दिखाई देता है। यह देवीय कृपा से संभव है। लोककथा के अनुसार जब माता सती ने आत्म त्याग किया था । उसके बाद शिव जी बहुत क्रोधित हो गए थे । इसलिए भगवान विष्णु जी उन्हें शांत करने के लिए इस स्थान पर ले आए थे

लिखने बैठे जहा कहानी अपने क़िस्सो कीलिखते लिखते एक उम्र गवा बैठे,

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डरा करते थे, कभी जिन अंधेरो से अब वो हमे रास आने लगे इंतजार रहता था जिन उजालो का अब वही हमे जलाने लगे मुकक्दर से जो माँगा वो तो मिला ही नही पर जो पहले से अपना था वो भी गवा बैठे लिखने बैठे जहा कहानी अपने क़िस्सो की लिखते लिखते एक उम्र गवा बैठे, गवाना भी क्या इस कदर था, भूले भूले अपना सब लूटा बैठे।