लिखने बैठे जहा कहानी अपने क़िस्सो कीलिखते लिखते एक उम्र गवा बैठे,
डरा करते थे, कभी जिन अंधेरो से अब वो हमे रास आने लगे इंतजार रहता था जिन उजालो का अब वही हमे जलाने लगे मुकक्दर से जो माँगा वो तो मिला ही नही पर जो पहले से अपना था वो भी गवा बैठे लिखने बैठे जहा कहानी अपने क़िस्सो की लिखते लिखते एक उम्र गवा बैठे, गवाना भी क्या इस कदर था, भूले भूले अपना सब लूटा बैठे।