रमंति इति रामः।
रमंति इति रामः।
जो रोम रोम में कण कण में रमता है वही राम है।
श्री राम भगवान, जिन्होंने त्रेता युग में सत युग से बदलते मानव मूल्यों को स्थापित करने हेतु अवतार लिया । मानवता के नए आदर्श प्रस्तुत करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम को अनेक कष्ट झेलने पड़े पर प्रभु कभी विचलित नहीं हुए
कभी आसान मार्ग नहीं अपनाया।
राम सबके हैं।
भगवान राम का चरित्र इस प्रकार का है कि यह आग्रहपूर्वक अपने को परम्परासम्मत और मर्यादित रखता है। आज कुछ लोगों के लिए परम्परासम्मत होना दक़ियानूसी है, लेकिन यह समाज की व्यवस्था और अनुशासन या जिसे रामराज्य कहते हैं,
उसकी बुनियाद है। परम्परा के साथ होना प्रतिगामी होना नहीं है । #परम्परा हमारे सदियों के अनुभव और अभ्यास से बने मूल्यों का जीवन्त समूह है और इसके साथ होने का मतलब अपने को निरन्तर जीवन्त और अद्यतन रखना है । परम्परा राम के आचार-विचार में जीवन्त है- यह उनकी वाणी में है,
और यह उनकी जिह्वा पर है। जब वे कुछ कहते हैं, तो लगता जैसे परम्परा जीवन्त रूप में अपना मन्तव्य हमारे सामने रख रही हो। यह परम्परा ठहरी हुई परम्परा नहीं है, यह गतिशील और जीवन्त परम्परा है। परम्परा यदि ठहर जाये, तो फिर यह अपने अर्थ और अभिप्राय से विचलित लगती है।
भारत के मूल अस्तित्व की पहचान यहां की पुरानी परम्परा और ईश्वर के अस्तित्व के बिना असंभव है।
इसी पहचान को बनाए रखने के लिए ।
"विधि का विधाता होते हुए भी, जो विधि के साथ चले। वो श्री राम है।
परंपराया: समर्थनं कुरु, विनाशं वारयितुम् ।।
परंपरा को बढ़ावा दें, पतन को रोकें ।
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