शब्दों से प्रेम किया हमने
अब मिलकर उनसे कुछ कहते
कब तक यूँ भला तुम चुप रहते
इक उम्र बिता दी राह तके
पर इरादे थे जो नहीं थके
मन ही मन में न जाने
कितनी बातें कह डाली,
संपर्क सूत्र तो बना नहीं
निर्झर सी रही सूखी नाली,
अब निश्चय प्रेम जता पाते
वो स्तब्ध भले मिलने आते!!
उनकी हस्ती कुछ ऐसे थी
कुछ हम जैसी
कुछ कैसी थी
कुछ हम भी बयां कर पाते
पर्दों पे परदे थे,
पर्दों से परदा शायद उठा पाते
वो स्तब्ध भले मिलने आते!!
मनाने का हुनर हमें आता कहाँ से
वो तो गैर की झलक से बिन मनाये ही मान जाते
श्वेत चंद्र से हमें दिखते थे
दूर से ही सही, खूब रिझाते
इक दिन चांदनी में दिखे वो
आसमान किसी और को उढ़ाते
शब्दों से प्रेम किया हमने
पर शब्द लिखें, न बुने, न कहे
न सुने उनने,
उनकी भी क्या खता बताते
अब निश्चय प्रेम जता पाते
वो स्तब्ध भले मिलने आते!!
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