एक ही ईश्वर हैं
आचार व्यवहार में हैं, इन सबके पीछे क्या हैं ?
इष्ट हैं अनिष्ट हैं ?
वृत्ति का निरोध करता हैं ?
अनपढ़, पढ़ लिख कर अपनी जड़ों से कटना ही अनपढ़ता हैं ।
चित भूमि,
इंसान का हक जानवर से ऊपर कैसे ? ये हमारा संस्कार नहीं,
आलंबन, दो ज्ञान की पद्धति है ,
हमारी जो संस्कृति हैं वो ज्ञान की संस्कृति हैं,
ज्ञान तो सीमित हो गया , आधुनिक युग में।
जो गंदगी दूर करता हैं वो जल कैसे गंदा हो सकता हैं।
लोग अपने ध्येय में नहाते हैं।
फ्रीडम फ्राम वांट
फ्रीडम तो क्रिएट सरप्लस
मूल में भेद हैं,
१ सेंचुरी में शास्त्र का बोल बाला था।
स्पार्कल ऑफ़ divin हैं,
पुरुष एवम् परकृति ही ब्रम्भ हैं।
एक ही ईश्वर हैं ,
निराकार हैं पर निर्गुण नही हैं, अभ्र्ममिक गॉड
अभियान चलाया की आशा के बिना बिज का उत्सर्जन नहीं किया जा सकता है ,
तत्वमसी के मायने इस परकार बदल जाते हैं जब जीव अपने भीतर से न देखते हुए मन की द्वारे बनाए गए आडंबर में फसा हो।
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