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यात्रा २३.०४.२०८१

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सभी चमक धमक के अपने ह्रदय को कोमल बना कर चल दिए, जाना था मंदिर जहा विराजमान हैं, परम भक्त श्री हनुमान जो भक्ति के सागर हैं भगवान राम नाम जाप में ध्यानरत रहते हैं सदेव, आज उनकी जयंती हैं समाज का के बड़ा वर्ग उनके आशिर्वाद को आतुर मंदिर मंदिर लाइन में लगा हैं। कहते है न ना जाने किस रूप में हरी मिल जायेंगे। आज अनुभव का दिन हैं अपनी ऊर्जा बढ़ाने का दिवस हैं सभी साधक लग गए हैं अपनी ऊर्जा को और शक्ति और गति देने में। भगवान सबकी रक्षा करते हैं। जय श्री राम।

यात्रा २२.०४.२०२४

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हवा को चिरती एक मक्खी, जिसे न धर्म का पता न ही धम्म का मक्खी निरंतर अपने पंखोंसे विजार जैसे पहाड़ वाली व्यार से लड़ रही हैं। एक मक्खी की कितनी मुस्कले हैं आज तक या तो मक्खी जानती हैं या उसके पंख।

Delhi Metro 10.04.2024

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आज मेट्रो में जब मैं ५२ से आगे की मेट्रो के लिए जा रहा था तभी मेट्रो में बैठे दो युवक मुझे देख के हस रहे थे, क्योंकि में अपनी जगह में खड़े होकर अपने इष्ट मन ही मन भज रहा था,  वो क्यों मेरा उपहास कर रहे थे नही पता , मेरे कद को देख कर, मेरे वस्त्र को देख कर, मेरे माथे पे लगे तिलक को देख कर अथवा किसी अन्य कारण से। मेने उन्हे घूरते हुए नाराजगी जताने की कोशिश की फिर भी नहीं माने, मैं उनको मूर्ख कहूं या ये सोचते हुए अपसोस करूं की कुछ नहीं कह सका उनको कोईकी मुसझे अधिद मजबूत दिख रहे थे, राम जाने , अब तो ये पीड़ा एक समय के बाद ही जाएगी, काश हमारे शार्प देने की शक्ति आज भी काम करती, डर ही आनंद लेते समय यह मार्ग दिखाता हैं की ये अनुचित हैं या उचित। राम मेरी पीड़ा को दूर करें।

शब्दों से प्रेम किया हमने

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अब मिलकर उनसे कुछ कहते कब तक यूँ भला तुम चुप रहते इक उम्र बिता दी राह तके पर इरादे थे जो नहीं थके मन ही मन में न जाने कितनी बातें कह डाली, संपर्क सूत्र तो बना नहीं निर्झर सी रही सूखी नाली, अब निश्चय प्रेम जता पाते वो स्तब्ध भले मिलने आते!! उनकी हस्ती कुछ ऐसे थी कुछ हम जैसी कुछ कैसी थी कुछ हम भी बयां कर पाते  पर्दों पे परदे थे, पर्दों से परदा शायद उठा पाते वो स्तब्ध भले मिलने आते!! मनाने का हुनर हमें आता कहाँ से वो तो गैर की झलक से बिन मनाये ही मान जाते श्वेत चंद्र से हमें दिखते थे दूर से ही सही, खूब रिझाते इक दिन चांदनी में दिखे वो आसमान किसी और को उढ़ाते शब्दों से प्रेम किया हमने पर शब्द लिखें, न बुने, न कहे न सुने उनने, उनकी भी क्या खता बताते अब निश्चय प्रेम जता पाते वो स्तब्ध भले मिलने आते!!

एक ही ईश्वर हैं

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आचार व्यवहार में हैं, इन सबके पीछे क्या हैं ?  इष्ट हैं अनिष्ट हैं ?  वृत्ति का निरोध करता हैं ? अनपढ़, पढ़ लिख कर अपनी जड़ों से कटना ही अनपढ़ता हैं । चित भूमि,  इंसान का हक जानवर से ऊपर कैसे ? ये हमारा संस्कार नहीं, आलंबन, दो ज्ञान की पद्धति है ,  हमारी जो संस्कृति हैं वो ज्ञान की संस्कृति हैं,  ज्ञान तो सीमित हो गया , आधुनिक युग में। जो गंदगी दूर करता हैं वो जल कैसे गंदा हो सकता हैं। लोग अपने ध्येय में नहाते हैं। फ्रीडम फ्राम वांट फ्रीडम तो क्रिएट सरप्लस  मूल में भेद हैं,  १ सेंचुरी में शास्त्र का बोल बाला था। स्पार्कल ऑफ़ divin हैं, पुरुष एवम् परकृति ही ब्रम्भ हैं। एक ही ईश्वर हैं ,  निराकार  हैं पर निर्गुण नही हैं, अभ्र्ममिक गॉड अभियान चलाया की आशा के बिना बिज का उत्सर्जन नहीं किया जा सकता है , तत्वमसी के मायने इस परकार बदल जाते हैं जब जीव अपने भीतर से न देखते हुए मन की द्वारे बनाए गए आडंबर में फसा हो।

तंत्र

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भारत में, सूर्य की प्रात: पूजा कोर्नकांक में,  मध्यान की कौशल में, और शाम की पुजा मुल्तान में।

रमंति इति रामः।

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रमंति इति रामः।  जो रोम रोम में कण कण में रमता है वही राम है।  श्री राम भगवान,  जिन्होंने त्रेता युग में सत युग से बदलते मानव मूल्यों को स्थापित करने हेतु अवतार लिया । मानवता के नए आदर्श प्रस्तुत करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम को अनेक कष्ट झेलने पड़े पर प्रभु कभी विचलित नहीं हुए कभी आसान मार्ग नहीं अपनाया।  राम सबके हैं। भगवान राम का चरित्र इस प्रकार का है कि यह आग्रहपूर्वक अपने को परम्परासम्मत और मर्यादित रखता है। आज कुछ लोगों के लिए परम्परासम्मत होना दक़ियानूसी है, लेकिन यह समाज की व्यवस्था और अनुशासन या जिसे रामराज्य कहते हैं,  उसकी बुनियाद है। परम्परा के साथ होना प्रतिगामी होना नहीं है । #परम्परा हमारे सदियों के अनुभव और अभ्यास से बने मूल्यों का जीवन्त समूह है और इसके साथ होने का मतलब अपने को निरन्तर जीवन्त और अद्यतन रखना है । परम्परा राम के आचार-विचार में जीवन्त है- यह उनकी वाणी में है,  और यह उनकी जिह्वा पर है। जब वे कुछ कहते हैं, तो लगता जैसे परम्परा जीवन्त रूप में अपना मन्तव्य हमारे सामने रख रही हो। यह परम्परा ठहरी हुई परम्परा नहीं है, य...